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धूमिल की कविताओं में सत्ता की निरंकुशता के दंश और उन्माद को बख़ूबी पढ़ा जा सकता है। समाज का रेखाचित्र तो लगभग हर कविता में दिखता ही है। साम्राज्यवादी पूँजीवादी व्यवस्था की जकड़न से, बिखरते समाजवाद के खं...

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